लेमेन्स इवैंजलिकल फैलोशिप इंटरनैशनल


सेवकाई का आरंभ

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      परमेश्वर ने मेरे पिताजी को सन् १९३५ में पूरे समय के लिए अपनी सेवा में बुलाया था। मेरे पिताजी उन दिनों गणित के अध्यापक थे और संसारिक तथा आत्मिक दोनों ही रीति से बहुत ही आरामदायक स्थिति में थे। उनका आत्मिक असर बहुत से लोगों को महसूस हो रहा था और बहुतों को आशिष मिल रही थी। जब उन्होंने इस आजीवन सेवा के रास्ते पर कदम रखा और अपनी सारी ज़रूरतों, साधनों का भरोसा एकमात्र परमेश्वर पर रखा तो उनकी कभी न खत्म होने वाली बैंक गारन्टी थी – यहोवा यीरे, परमेश्वर उपलब्ध कराएंगे। इस तरह शुरूआत से ही इस सेवा के लिए कभी लोगों से पैसों की अपील नहीं की गई। आज भी यह सेवा अनकही भेंटों से जारी है, जो परमेश्वर प्रार्थना के जवाब में भेजते हैं।

     जल्द ही भारत के दक्षिणी जिलों के उन स्थानों में आत्मिक जागृति फैलने लगी जहाँ मेरे माता-पिता को वचन प्रचार के लिए बुलाया गया। उथल-पुथल समाज और चर्च जहाँ घृणा और डाह राज कर रही थी, वहाँ परमेश्वर के बलवान हाथों ने उसे छू कर पूरी तरह बदल दिया। शांति और प्रेम ने झगड़ों और कचहरी-मुकद्दमों को दूर कर उसकी जगह ले ली। लोगों के ऊपर परमेश्वर के पश्चाताप का सामर्थी आत्मा उतरा, चारों तरफ लोग सालों पहले चोरी किया, धोखे से अपने पास रखी चीज़ों और पैसों को वापस लौटाने लगे। सरकार को भी भारी मात्रा में ऐसा पैसा और चीज़ें लौटाईं गईं।

     आज भी यह परमेश्वर की सामर्थी ताकत अनेक जगहों पर काम कर रही है और जारी है।

     अब जगत भर में, जहाँ कहीं लोगों के मन में बदलने की सच्ची इच्छा है और परमेश्वर की शर्त – कि हम ‘अपने को नम्र करें’ को पूरा करने को तैयार हैं, परमेश्वर अनेक धर्मों, मतों के लोगों से मिल, उन्हें बदल रहे हैं। अंधेर में लाठी घुमाने की बजाये – जिसे लोग आजकल धर्म का नाम देते हैं, लोग प्रभु यीशु से मिल रहे हैं और परमेश्वर पुरुष-स्त्रियों से बातें कर रहे हैं।

-       जोशुआ दानिएल।